बाड़मेर के कलियुगी किसान: खेत में अन्न नहीं, ज़हर उगता हुआ
यह सिर्फ खबर नहीं—
यह बाड़मेर की धूल में मिलती जा रही सभ्यता पर करारा तमाचा है।
आज बाड़मेर के कुछ खेतों में वह उग रहा है जो युवाओं को पलभर का झूठा स्वर्ग दिखाकर ज़िंदगी भर का नरक थमा देता है।
एमडी—कलियुग की वह फसल,
जिसकी सिंचाई लालच से होती है
और कटाई लाशों में।
तीन एमडी फैक्ट्रियों का पकड़ा जाना क्या वाकई उपलब्धि है?
या यह उस सच्चाई की स्वीकारोक्ति कि मौत के कारखाने महीनों–सालों तक हमारी आंखों के सामने चलते रहे?
इतना रॉ मैटेरियल, मशीनें, मजदूर—सब आया, सब लगा, सब चला…
और सिस्टम सोता रहा।
बाड़मेर कोई साधारण जिला नहीं।
यह सीमावर्ती इलाका है—जहां का युवा पहले ही बेरोजगारी, तस्करी और नशे की त्रासदी से जूझ रहा है।
अब अगर खेत ही नशा पैदा करेंगे, तो यह इलाका युवा नशा बॉर्डर बन जाएगा।
यह विफलता सिर्फ पुलिस की नहीं—
यह प्रशासन, खुफिया तंत्र और समाज—तीनों की असफलता है।
सवाल सीधा है:
ज़हर बोया गया, मगर पहरेदार कहां थे?
अगर अब भी आंखें नहीं खुलीं,
तो आने वाली पीढ़ियां हमें अपराधी मानेंगी—
माफ़ नहीं करेंगी।

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