अजमेर। समाज में आज भी बेटे की चाहत कितनी गहरी है, इसका एक दर्दनाक उदाहरण अजमेर के किशनगढ़ से सामने आया है। यहां 45 वर्षीय एक महिला ने सातवीं बार भी बेटी को जन्म दिया, लेकिन आर्थिक तंगी, सामाजिक दबाव और पारिवारिक हालात के चलते नवजात बच्ची को महज 26 घंटे बाद ही अपनी जान गंवानी पड़ी। यह घटना न सिर्फ एक मेडिकल केस है, बल्कि बेटी को बोझ समझने वाली सोच और व्यवस्था की असंवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े करती है।
मामला जवाहरलाल नेहरू अस्पताल से जुड़ा है, जहां नवजात बालिका को जन्म दिया गया था। बच्ची के जन्म के बाद परिजन उसे लेकर घर ले गए, लेकिन कुछ ही घंटों में उसकी तबीयत बिगड़ गई और उसकी मौत हो गई। इसके बाद शव को अस्पताल लाया गया, जहां पुलिस को सूचना दी गई।
पत्रिका में 20 दिसंबर को प्रकाशित खबर के बाद मदनगंज थाना पुलिस सक्रिय हुई और पूरे मामले की जांच शुरू की गई। जांच में सामने आया कि महिला पहले से छह बेटियों की मां है। बेटे की उम्मीद में सातवीं बार गर्भवती हुई थी। परिवार को भरोसा था कि इस बार ‘घर का चिराग’ आएगा, लेकिन बेटी के जन्म ने उनकी उम्मीदें तोड़ दीं।
महिला का पति कुछ दिन पहले सड़क हादसे में घायल हो चुका है और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। इलाज का खर्च, घर की जिम्मेदारियां और समाज का लगातार दबाव महिला पर भारी पड़ता गया। ऐसे हालात में सातवीं बेटी के जन्म के बाद मां पूरी तरह टूट गई और परिस्थितियों के आगे हार मान बैठी।
शनिवार को मदनगंज थाने के हैडकांस्टेबल भंवर सिंह ने नवजात का शव उसके ताऊ को बिना पोस्टमार्टम के सुपुर्द किया। परिजनों ने पुलिस के सामने स्वीकार किया कि उनसे बड़ी भूल हुई है। हालांकि, यह सवाल अब भी कायम है कि क्या यह केवल एक परिवार की गलती है या फिर उस सोच की, जो आज भी बेटियों को समान अधिकार और सम्मान देने में पीछे है।

यह घटना समाज को आईना दिखाती है कि कल्पना चावला, मैरी कॉम, साक्षी मलिक और मिताली राज जैसी बेटियों के बावजूद आज भी कई घरों में बेटी को मजबूरी समझा जाता है। किशनगढ़ की यह घटना एक चेतावनी है कि जब तक मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक ऐसी त्रासद कहानियां सामने आती रहेंगी।


